जब खाने को कुछ और नहीं मिलेगा तो भाव ही खाना पड़ेगा ना!

शाहः स्वागत नहीं करोगे हमारा?

उद्ववः बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी-तैसी!

शाहः ये तो अच्छी बात नहीं है! आप हमें देखकर कुर्सी से उठे भी नहीं…

उद्धवः मैं सब जानता हूँ! जो आपके सामने कुर्सी छोड़ देता है, उसे फिर वो कुर्सी वापस नहीं मिलती।

शाहः अरे…अरे…ऐसी भी क्या नाराज़गी उद्धव भाई! ऐसे नहीं बोलते…

उद्धवः अब तो 2019 के इलेक्शन तक ऐसे ही बोलूँगा!

शाहः मान भी जाओ…इतना भाव मत खाओ!

उद्धवः जब खाने को कुछ और नहीं मिलेगा तो भाव ही खाना पड़ेगा ना!

शाहः अच्छा ठीक है! मैं बोलूँगा देवेंद्र को कि सब मिल बाँट के खायें…

उद्धवः चार साल तक अकेले मलाई मारते रहते हैं, पाँचवें साल में हमें ख़ैरात देने आ जाते हैं। आपने हमें समझ क्या रक्खा है मोटाभाई?

शाहः अरे…आप तो मालिक हैं उद्धव भाई मालिक!

उद्धवः पार्टनर्स को नौकर बना के रखते हो…और कहते हो मालिक! वाह मोटाभाई वाह!

शाहः मैं कह रहा हूँ…साथ मिलकर लड़ लो!

उद्धवः आपके साथ नहीं…अब तो आप ही से लड़ेंगे!

शाहः प्यार से मान जाओ…नहीं तो…

उद्धवः नहीं तो क्या कर लोगे?

शाहः नहीं तो मेरा ‘तोता’ काट लेगा तुम्हें!

उद्धवः तोता?

शाहः तोता…मतलब सीबीआई! मैं उन्हें बोल के आया हूँ कि…

उद्धवः ये तोते का डर शरद पवार को दिखाना, मैं नहीं डरता ऐसे तोते और कव्वों से!

शाहः सोच लो! मैं सूटकेस साथ ले के आया हूँ।

उद्धवः अच्छा जी!

शाहः एक भी विधायक नहीं बचेगा तुम्हारे पास! रातों-रात सबको अपनी तरफ़ मिला लूँगा।

उद्धवः ये भी ट्राई करके देख लो…

शाहः ठीक है तो फिर सुबह मॉर्निंग वॉक पे मिलते हैं… (कहकर वो उठकर चल देते हैं)

उद्धवः अरे…अरे…मैं तो मज़ाक कर रहा था मोटाभाई! आप मज़ाक भी नहीं समझते क्या?

शाहः मैं भी मज़ाक कर रहा था…मैं मॉर्निंग वॉक पे जाता ही नहीं! अगर जाता तो ये इतना निकला होता क्या! ही…ही…ही! (पेट पर हाथ फिराते हुए कहते हैं)

(दोनों गले में हाथ डाले हुए कमरे से बाहर निकल आते हैं और मीडिया को हँस-हँसकर पोज़ देने लगते हैं)