Story Of Pakoda Gujarat To Delhi

प्रधानमंत्री जी गुजरात से आते हैं, जहाँ चिप्स, पापड़, मिठाई, कचौड़ी, जलेबी, पकौड़ी बेचने वाला आदमी भी महीने के 25-50 हज़ार कमा लेता है! थोड़ा भी अकलमंद व्यापारी हो तो करोड़ों में खेलता है! यदि ऐसे माहौल से आने वाला आदमी पकौड़ा बेचने को रोज़गार बोल दे तो हम उत्तर भारत वालों को मिर्ची लगनी स्वाभाविक ही है क्योंकि हमारे यहाँ व्यापार, स्वरोज़गार को बहुत ही ओछी निगाह से देखते हैं।

लेकिन गुजरात में आप यदि महीने के 15-20 हज़ार की नौकरी करते हैं तो कोई ख़ास सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं रहेगी, क्योंकि आपके पड़ोस में एक पकौड़ी बनाने वाला हलवाई रहेगा जिसका एक अपना ख़ुद का बढ़ियाँ मकान रहेगा और आप उसे देख देखकर अपनी डिग्री को कोसेंगे! ऐसा ही माहौल है गुजरात में!

स्वरोज़गार को सकारात्मक नज़रिए से देखने वाले गुजरात में कोई बेकार नहीं मिलेगा! गुजरात में बहुतेरे लोग ज़्यादा नहीं पढ़े लिखे हैं लेकिन लाखों कमा लेते हैं! लेकिन हमारे यहाँ बात एकदम विपरीत है! डिग्रियां गले मे टांगे नौकरी ढूंढते फिरेंगे लेकिन कुछ सीखेंगे नही और ना कुछ स्वयं से करने का प्रयास करेंगे अतः समस्या मोदी जी के वक्तव्य में नहीं है, समस्या हमारे सोच व नज़रिए में है जिसने बड़ी मात्रा में बेरोज़गारी को जन्म दिया है!

नौकरी के भरोसे 10-15% लोगों का भला हो सकता है लेकिन शत प्रतिशत लोग रोज़गार कभी नहीं पा सकते, स्वरोज़गार ही एक मात्र विकल्प है, ये एक फ़ैक्ट है! अतः मोदी को तो कोसा जा सकता है लेकिन क्या ये फ़ैक्ट झूठलाया जा सकता है?